Monday, July 11, 2016

"सरल-सफलता "


सफलता की सबसे सरल परिभाषा है " सिमित समय में प्राप्त प्रगति को सफलता कहते हैं।" प्रगति ऐसी होनी चाहिए जो आंकी जा सके और जो एक निहित समय सीमा में हो। सफलता केवल किसी मंज़िल पर पहुँचना नहीं है बल्कि ये भी है कि आपने ये सफर कैसे तय किया और आपने ये मंज़िल कैसे हासिल की?

सफलता किस पर निर्भर करती है? सफलता निर्भर करती है हमारे विश्वास पर, हमारी सोच पर, हमारे कर्मों पर, हमारी आदतों पर और हमारे चरित्र पर। सफलता की नीवँ हमारे विश्वास पर टिकी है। हमें अगर विश्वास है कि हम सफल होंगे तो हम सफल होंगे। अगर हमें विश्वास है कि हम बुद्धिमान हैं तो हम बुद्धिमान होंगे।  अगर हमें विश्वास है कि भाग्यशाली हैं तो हम भाग्यशाली होंगे। आपने करतब-बाज  को सर्कस में रस्से पर चलते देखा होगा।  वह इसलिए चल पाता है क्यूँ कि उसे पूरा विश्वास है कि वह चल सकता है।  उसी प्रकार, आप भी ये विश्वास रखें की आप जो भी करना चाहें आप कर सकते हैं, चाहे दुनिया जो भी   कहे।  रस्से  पर चलने वाला  व्यक्ति यह नहीं सोचता कि नीचे लोग क्या कह रहे हैं। उसकी निगाह उसके मंज़िल पर टिकी होती है।  वह हर कदम पर अपना पूरा ध्यान लगाता है। पीछे मुड़ कर देखना उसके लिए मुमकिन नहीं और वह अपनी मंज़िल आने पर ही रुकता है। आप  भी उसी  भाँति अपनी ज़िन्दगी पूरे विश्वास के साथ जीएँ।

हमारे विश्वास  से हमारी सोच उत्पन्न होती है। हम दिन में करीब 80,000 बार सोचते  हैं परन्तु विषमता यह है कि इसमें से 80 % यानि कि लग-भग 60,000 विचार  हम बार-बार दोहराते हैं।  आइंस्टाइन ने कहा था " ये पागलपन है कि  हम बार-बार वही विचार सोचें और एक दूसरे परिणाम की कामना करें। " अगर हमें अपनी ज़िन्दगी बदलनी है तो हमें अपनी सोच को अपने वश में करना होगा, अपने विचार बदलने होंगे। सोच को वश में करने के लिए हमें अपनी सोच का द्रष्टा (observer) बन कर उस पर ध्यान देना होगा। तरक़ीब बहुत ही आसान है। शांति से कहीं बैठ जाएँ और ध्यान मन पर केंद्रित करें। देखें कि यह कैसे भटकता है। थोड़ी  देर में आपको दो सोच के  बीच में रिक्त स्थान मिलेगा जब मन कुछ नहीं सोच रहा होगा। निरंतर प्रयास  और अभ्यास से ये नहीं सोचने वाली स्थिति बढ़ती जाएगी और आपका मन बिलकुल शांत, आपके नियंत्रण  में होगा।

हमारी सोच हमारे कर्मों को जन्म देती है। हमारी सोच अगर सकारात्मक  है तो हमारे कर्म भी सकारात्मक होंगे। सकारात्मक कर्म (positive action) कैसें करें ? अगर हम हर कार्य को 100 % कर्तव्य-निष्ठां के साथ करें तो हमारा कार्य सकारात्मक होगा।  हर कार्य या तो आपको  आपके ध्येय की ओर ले जाता है या उससे दूर। अगर आप एक विद्यार्थी हैं और आप अपने प्लान के मुताबिक रोज़ तीन-चार घंटे पढ़ते हैं तो यह सकारात्मक कार्य है। इसके विपरीत अगर आप घंटो TV देखते हैं या अपने फ़ोन पर गेम्स खेलते हैं तो यह नकारात्मक कार्य है और ये आपको आपके ध्येय से दूर ले जाएगा।

किसी भी काम को हम लगातार करते हैं तो वह हमारी आदत हो जाता है। मनुष्य अपनी आदतों के अलावा कुछ भी नहीं है। एक नई आदत को परिपक्व होने में कम से कम 21 दिन लगते हैं।  अगर आप 5 बजे सुबह उठकर पढ़ना चाहते हैं या व्यायाम करना चाहते हैं तो यह आपको 21 दिनों तक लगातार करना होगा।  फिर ये आपकी आदत हो जाएगा।अपनी आदतों पर ग़ौर करें और जो आदतें आपके प्रगति के मार्ग में बाधक हैं, उन्हें शीघ्र त्याग दें। आदतों से ही हमारा चरित्र बनता है। अगर हमारी आदतें अच्छी है तो हमारा चरित्र भी निष्ठावान और बलशाली होगा। हमारे चरित्र पर ही हमारी किस्मत निर्भर करती है। 

तो हमने देखा कि सफलता वस्तुतः हमारे विश्वास पर टिकी है। विश्वास से हमारी सोच उपजती है।  सोच से हम कार्य करते हैं। लगातार किसी भी कार्य को करने से हमारी आदत बनती है और आदत से हमारा चरित्र।  अगर हम अपने विशवास को, अपनी सोच को, अपने कार्यों को और अपनी आदतों को अपने वश में कर लें तो इसमें कोई शक़ नहीं कि एक दिन सफलता हमारे क़दम चूमेगी।

मनीश कुमार भारतीय वायु सेना में पॉयलट रह चुके हैं। वह  प्रेरणादायी  पुस्तक " बी योर ओन पायलट " के लेखक हैं और एक प्रेरणात्मक वक्ता भी।

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